
हिंसा-वयणं ण वयदि कक्कस-वयणं पि जो ण भासेदि
णिट्ठुर-वयणं पि तहा ण भासदे गुज्झ-वयणं पि ॥333॥
हिद-मिद-वयणं भासदि संतोस-करं तु सव्व-जीवाणं
धम्म-पयासण-वयणं अणुव्वदी होदि सो बिदिओ ॥334॥
अन्वयार्थ : [जो हिंसावयणं ण वयदि] जो हिंसा के वचन नहीं कहता है [कक्कसवयणं पि ण भासेदि] कर्कश वचन भी नहीं कहता है [णिठुरवयणं पि तहा] तथा निष्ठुर वचन भी नहीं कहता है [गुज्झवयणं पि ण भासदे] और पर का गुह्य वचन भी नहीं कहता है । [हिदमिदवयणं भासदि] पर के हित रूप तथा प्रमाणरूप वचन कहता है [तु सव्वजीवाणं संतोसकर] सब जीवों को सन्तोष करनेवाले वचन कहता है [धम्मपयासणवयणं] धर्म का प्रकाश करनेवाले वचन कहता है [सो बिदिओ अणुव्वदि होदि] वह पुरुष दूसरे अणुव्रत का धारी होता है ।
छाबडा