+ अचौर्य अणुव्रत -
जो बहु-मुल्लं वत्थुं अप्पय-मुल्लेण णेव गिण्हेदि
वीसरियं पि ण गिण्हदि लाहे थोवे वि तूसेदि ॥335॥
जो पर-दव्वं ण हरदि माया-लोहेण कोह-माणेण
दिढ-चित्तो सुद्ध-मई अणुव्वई सो हवे तिदिओ ॥336॥
अन्वयार्थ : [जो बहुमुल्लं वत्थुं अप्पमुल्लेण णेय गिण्हेदि] जो श्रावक बहुमूल्य वस्तु को अल्पमूल्य में नहीं लेता है [वीसरियं पि ण गिण्हदि लाहे थोये वि तूसेदि] किसी की भूली हुई वस्तु को नहीं लेता है, व्यापार में थोड़े ही लाभ से सन्तोष करता है [जो मायालोहेण कोहमाणेण परदव्यं ण हरइ] जो कपट से, लोभ से, क्रोध से, मान से दूसरे के द्रव्य का हरण नहीं करता है [दिढचित्तो] जो दृढ़ चित्त है (कारण पाकर प्रतिज्ञा को भंग नहीं करता है) [सुद्धमई] शुद्ध बुद्धिवाला होता है [सो तिदिओ अणुव्वई हवे] वह तीसरे अणुव्रत का धारक श्रावक होता है ।

  छाबडा