
असुइ-मयं दुग्गंधं महिला-देहं विरच्चमाणो जो
रूवं लावण्णं पि य मण-मोहण-कारणं मुणइ ॥337॥
जो मण्णदि पर-महिलं जणणी-बहिणी-सुआइ-सारिच्छं
मण-वयणे काएण वि बंभ-वई सो हवे थूलो ॥338॥
अन्वयार्थ : [जो महिलादेहं असुइमयं दुग्गंधं] जो श्रावक स्त्री के शरीर को अशुचिमयी दुर्गन्धयुक्त जानता हुआ [रूवं लावण्णं पि य मणमोहणकारणं मुणइ] उसके रूप तथा लावण्य को भी मन में मोह उत्पन्न करने का कारण जानता है [विरच्चमाणो] इसलिये विरक्त होता हुआ प्रवर्तता है [जो परमहिलं जणणी बहिणीसुआइसारिच्छं मणवयणे कायेण वि मण्णदि] जो पर-स्त्री को, बड़ी को माता के समान, बराबर की को बहिन के समान, छोटों को पुत्री के समान मन-वचन-काय से जानता है [सो थूलो बंभवई हवे] वह स्थूल ब्रह्मचर्य का धारक श्रावक है ।
छाबडा