+ परिग्रह-परिमाण अणुव्रत -
जो लोहं णिहणित्ता संतोस-रसायणेण संतुट्ठो
णिहणदि तिण्हा दुट्ठा मण्णंतो विणस्सरं सव्वं ॥339॥
जो परिमाणं कुव्वदि धण-धण्णं -सुवण्ण-खित्तमाईणं
उवओगं जाणित्ता अणुव्वदं पंचमं तस्स ॥340॥
अन्वयार्थ : [जो लोहं णिहणित्ता सतोसरसायणेण संतुट्ठो] जो पुरुष लोभ-कषाय को हीन कर संतोष रूप रसायन से संतुष्ट होकर [सव्वं] सब [धणधाणसुवण्णखित्तमाईणं] धन, धान्य, सुवर्ण, क्षेत्र आदि परिग्रह को [विणस्सरं मण्णंतो] विनाशीक मानता हुआ [दुट्ठा तिण्हा णिहणदि] दुष्ट तृष्णा को अतिशयरूप से नाश करता है [उवओगं जाणित्ता] (धन, धान्य, सुवर्ण, क्षेत्र आदि परिग्रहका) अपना उपयोग (आवश्यकता एवं सामर्थ्य) जानकर उसके अनुसार [जो परिमाणं कुव्वदि] जो परिमाण करता है [तस्स पंचमं अणुव्वदं] उसके पाँचवाँ अणुव्रत होता है ।

  छाबडा