
जह लोह-णासणट्ठं संग-पमाणं हवेइ जीवस्स
सव्व-दिसाण पमाणं तह लोहं णासए णियमा ॥341॥
जं परिमाणं कीरदि दिसाण सव्वाण सुप्पसिद्धाणं
उवओगं जाणित्ता गुणव्वदं जाण तं पढमं ॥342॥
अन्वयार्थ : [जह लोहणासणट्ठं जीवस्स संगपमाणं हवेइ] जैसे लोभ का नाश करने के लिये जीव के परिग्रह का परिमाण होता है [तह सव्वं दिसिसु पमाणं णियमा लोहं णासए] वैसे ही सब दिशाओं में परिमाण किया हुआ भी नियम से लोभ का नाश करता है [सव्वाणं सुप्पसिद्धाणं दिसाण] इसलिये सब ही पूर्व आदि प्रसिद्ध दस दिशाओं का [उवमोगं जाणिचा] अपना उपयोग जानकर [जं परिमाणं कीरदि] जो परिमाण करता है [तं पढमं गुणव्वदं जाण] वह पहिला गुणव्रत है ।
छाबडा