+ अनर्थदण्ड व्रत -
कज्जं किं पि ण साहदि णिच्चं पावं करेदि जो अत्थो
सो खलु हवदि अणत्थो पंच-पयारो वि सो विविहो ॥343॥
अन्वयार्थ : [जो अत्थो कज्ज किंपि ण साहदि णिच्चं पावं करेदि] जो कार्य प्रयोजन तो अपना कुछ सिद्ध करता नहीं है और केवल पाप ही को उत्पन्न करता है [सो खलु अणत्थो हवे] वह अनर्थ कहलाता है [सो पंचपयारो विविहो वि] वह पांच प्रकार का है तथा अनेक प्रकार का भी है ।

  छाबडा