
पर-दोसाण वि गहणं पर-लच्छीणं समीहणं जं च
परइत्थी-अवलोओ पर-क लहालोयणं पढमं ॥344॥
अन्वयार्थ : [परदोसाणं वि गहणं] दूसरे के दोषों को ग्रहण करना [परलच्छी समीहणं जंच] दूसरे की लक्ष्मी की वांछा करना [परइत्थी अवलोओ] दूसरे की स्त्री को रागसहित देखना [परकलहालोयणं] दूसरे की कलह को देखना इत्यादि कार्यों को करना [पढमं] सो पहिला अनर्थदण्ड है ।
छाबडा