जं सवणं सत्थाणं भंडण-वसियरण-काम-सत्थाणं
पर-दोसाणं च तहा अणत्थ-दंडो हवे चरिमो ॥348॥
अन्वयार्थ : [जं सत्थाणं भंडणवसियरणकामसत्थाणं सवणं] जो सर्वथा एकान्त मतवालों के बनाये हुए कुशास्त्र तथा भांडक्रिया हास्य कौतूहल के कथन के शास्त्र, वशीकरण मंत्र प्रयोग के शास्त्र तथा स्त्रियों की चेष्टा के वर्णनरूप काम-शास्त्र आदि का सुनना / सुनाना / पढना / पढाना [परदोसाणं च तहा] दूसरे के दोषों को कथा करना / सुनना [चरमो अणत्थदंडो हवे] दुःश्रुतिश्रवण नामक अन्तिम पाँचवाँ अनर्थदण्ड है ।

  छाबडा