
एवं पंच-पयारं अणत्थ-दंडं दुहावहं णिच्चं
जो परिहरेदि णाणी गुणव्वदी सो हवे बिदिओ ॥349॥
अन्वयार्थ : [जो णाणी] जो ज्ञानी श्रावक [एवं पंचपयारं अणत्थदंड दुहावहं णिच्चं परिहरेदि] इसप्रकार पाँच प्रकार के अनर्थदण्ड को निरन्तर दुःखों का उत्पन्न करनेवाला जानकर छोड़ता है [सो विदिओ गुणव्वदी हवे] वह दूसरे गुणव्रत का धारक श्रावक होता है ।
छाबडा