+ भोगोपभोग परिमाण गुणव्रत -
जाणित्ता संपत्ती भोयण-तंबोल-वत्थमादीणं
जं परिमाणं कीरदि भोउ बभोयं वयं तस्स ॥350॥
अन्वयार्थ : [संपत्ती जाणिवा] जो अपनी सम्पदा सामर्थ्य जानकर [भोयणतंबोलवत्थमादिणं] भोजन ताम्बूल वस्त्र आदि का [जं परिमाणं कीरदि] परिमाण (मर्यादा) करता है [तस्स भोउवभोयं वयं] उस श्रावक के भोगोपभोग नामक गुणव्रत होता है ।

  छाबडा