
जो परिहरेइ संतं तस्स वयं थुव्वदे सुरिंदो वि
जो मण-लड्डु व भक्खदि तस्स वयं अप्प-सिद्धियरं ॥351 ॥
अन्वयार्थ : [जो संतं परिहरेइ] जो पुरुष, होतो हुई वस्तु को छोड़ता है [तस्स वयं सुरिंदो वि थुम्बदे] उसके व्रत की सुरेन्द्र भी प्रशंसा करता है [जो मणलड्ड व भक्खदि तस्स वयं अप्पसिद्धियरं] और अनुपस्थित वस्तु का छोड़ना तो ऐसा है जैसे लड्डू तो हों नहीं और संकल्पमात्र मन में लड्डू की कल्पना कर लड्डू खावे वैसा है।
छाबडा