
जत्थ ण कलयल-सद्दो बहु-जण-संघट्ठणं ण जत्थत्थि
जत्थ ण दंसादीया एस पसत्थो हवे देसो ॥353॥
अन्वयार्थ : [जत्थ ण कलयलसदो] जहाँ कलकलाट शब्द नहीं हो [बहुजणसंघट्टणं ण जत्थत्थि] जहाँ बहुत लोगों के संघट्ट का आना जाना न हो [जत्थ ण दंसादीया] जहाँ डाँस, मच्छर, चिउंटी आदि शरीर को बाधा पहुँचानेवाले जीव न हों [एस पसत्थो हवे देसो] ऐसा क्षेत्र सामायिक करने के योग्य है ।
छाबडा