
बंधित्ता पज्जंकं अहवा उह्नेण उब्भओ ठिच्चा
काल-पमाणं किच्चा इंदिय-वावार-वज्जिदो होउं ॥355॥
जिण-वयणेयग्ग-मणो संवुड -काओ य अंजलिं किच्चा
स-सरू वे संलीणो वंदण-अत्थं विंचिंतंतो ॥356॥
किच्चा-देस-पमाणं सव्वं-सावज्ज-वज्जिदो होउं
जो कुव्वदि सामइयं सो मुणि-सरिसो हवे ताव ॥357॥
अन्वयार्थ : [जो पज्जंकं बंधित्ता] जो पर्यंक आसन बाँधकर [अहवा उड्ढेण उब्भओ ठिच्चा] अथवा खड्गासन से स्थित होकर [कालपमाणं किच्चा] काल का प्रमाण कर [इंदियवावारवज्जिदो होऊं] इन्द्रियों का व्यापार विषयों में न होने के लिये [जिणवयणेयग्गमणो] जिन वचन में एकाग्र मन कर [संवुडकाओ य अंजलिं किच्चा] काय को संकोचकर हाथों से अंजुलि बनाकर [ससरूवे संलीणो] अपने स्वरूप में लीन होकर [वंदणअत्थं विचिंतंतो] अथवा सामायिक के, वन्दना के पाठ के अर्थ का चितवन करता हुआ प्रवृत्ति करता है [देसपमाणं किच्चा] क्षेत्र का परिमाण कर [सव्वं सावजवजिदो होउ] सर्व सावद्ययोग का त्यागकर सर्व पापयोग से रहित होकर [सामइयं कुव्वदि] सामायिक करता है [सो ताव मुणिसरिसो हवे] वह श्रावक उससमय मुनि के समान है ।
छाबडा