
ण्हाण-विलेवण-भूसण-इत्थी-संसग्ग-गंध-धूवादी
जो परिहरेदि णाणी वेरग्गाभूसणं कि च्चा ॥358॥
दोसु वि पव्वेसु सया उववासं एय-भत्त-णिव्वियडी
जो कुणदि एवमाई तस्स वयं पोसहं बिदियं ॥359॥
अन्वयार्थ : [जो णाणी] जो ज्ञानी [दोसु वि पव्वेसु सया] एक पक्ष में दो पर्व अष्टमी चतुर्दशी के दिन [ण्हाणविलेवणभूसणइत्थीसंसग्गगंधधूपदीवादि परिहरेदि] स्नान, विलेपन, आभूषण, स्त्री का संसर्ग, सुगन्ध, धूप, दीप आदि भोगोपभोग वस्तुओं को छोड़ता है [वेरग्गाभरणभूसणं किच्चा] और वैराग्य भावना के आभरण से आत्मा को शोभायमान कर [उववासं एयभत्त णिव्वियडी जो एवमाई कुणइ] उपवास, एक वक्त, नीरस आहार करता है तथा आदि शब्द से कांजी करता है [तस्स पोसहं वयं बिदियं] उसके प्रोषधोपवास व्रत नामक शिक्षाव्रत होता है ।
छाबडा