
तिविहे पत्तम्हि सया सद्धाइ -गुणेहि संजुदो णाणी
दाणं जो देदि सयं णव-दाण-विहीहि संजुत्तो ॥360॥
सिक्खा-वयं च तिदियं तस्स हवे सव्व-सिद्धि-सोक्खयरं
दाणं चउव्विहं पि य सव्वे दाणाण सारयरं ॥361॥
अन्वयार्थ : [जो णाणी] जो ज्ञानी [तिविहे पत्तम्मि सया सद्धाइगुणेहिं संजुदो] तीन प्रकार के पात्रों के लिए श्रद्धा आदि गुणों से युक्त होकर [णवदाणविहीहि संजुत्तो सयं दाणं देदि] नवधाभक्ति से संयुक्त होता हुआ नित्यप्रति अपने हाथ से दान देता है [तस्स तदियं सिक्खावयं हवे] उस श्रावक के तीसरा शिक्षाव्रत होता है । वह दान कैसा है ? [दाणं चउव्विहं पि य] आहार, अभय, औषध, शास्त्रदान के भेद से चार प्रकार का है [सव्वे दाणाण सारयरं] अन्य लौकिक धनादिक के दानों में अतिशयरूप से सार है, उत्तम है [सव्वसोक्खसिद्धियरं] सब सिद्धि और सुख को करनेवाला है ।
छाबडा