
एक्कं पि वयं विमलं सद्दिट्ठी जइ कुणेदि दिढ-चित्तो
तो विविह-रिद्धि-जुत्तं इंदत्तं पावए णियमा ॥370॥
अन्वयार्थ : [सद्दिट्ठी] सम्यग्दृष्टि जीव [दिढचित्तो] दृढ़चित्त होकर [जइ] यदि [एक्कं पि वयं विमलं कुणेदि] एक भी व्रत का अतिचार-रहित निर्मल पालन करता है [तो विविहरिद्धिजुत्तं इंदत्तं णियमा पावए] तो अनेक प्रकारकी ऋद्धियों सहित इन्द्रपद को नियम से पाता है ।
छाबडा