
जो कुणदि काउसग्गं बारस-आवत्त -संजदो धीरो
णमण-दुगं पि कुणंतो चदु-प्पणामो पसण्णप्पा ॥371॥
चिंतंतो ससरूवं जिण-बिंबं अहव अक्खरं परमं
झायदि कम्म-विवायं तस्सवयं होदि सामइयं ॥372॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [वारसआवत्तसंजदो] बारह आवर्त्त सहित [चदुप्पणामो] चार प्रणाम सहित [णमणदुगं पि कुणंतो] दो नमस्कार करता हुआ [पसण्णप्पा] प्रसन्न है आत्मा जिसकी [धीरो] धीर होकर [काउसग्गं कुणदि] कायोत्सर्ग करता है [ससरूवं चिंतंतो] उससमय अपने चैतन्यमात्र शुद्ध स्वरूप का ध्यान चिन्तवन करता हुआ रहे [जिणबिंब अहव अक्खरं परमं] अथवा जिनबिंब का चिन्तवन करता रहे अथवा परमेष्ठी के वाचक पंच नमस्कार मन्त्र का चिन्तवन करता रहे [कम्मविवायं झायदि] अथवा कर्म के उदय के रस की जाति का चिन्तवन करता रहे [तस्स सामइयं वयं होदि] उसके सामायिक व्रत होता है ।
छाबडा