+ प्रोषध प्रतिमा -
सत्तमि -तेरसि-दिवसे अवरण्हे जाइऊण जिण-भवणे
किच्चा किरिया-कम्मं उववासं चउ-विहं गहिय ॥373॥
गिह-वावारं चत्ता रत्तिं गमिऊण धम्म-चिंताए
पच्चूसे उट्ठित्ता किरिया-कम्मं च कादूण ॥374॥
सत्थब्भासेण पुणे दिवसं गमिऊण वंदणं किच्चा
रत्तिं णेदूण तहा पच्चूसे वंदणं कि च्चा ॥375॥
पुज्जणविहिं च किच्चा पत्तं गहिऊण णवरि तिविहं पि
भुंजा विऊ ण पत्तं भुंजंतो पोसहो होदि ॥376॥
अन्वयार्थ : [सत्तमितेरसिदिवसे अवरण्हे जिणभवणे जाइऊण] सप्तमी त्रयोदशी के दिन दोपहर के बाद जिन चैत्यालय में जाकर [किरियाकम्मं किच्चा उववासं चउविहं गहिय] अपराह्न के समय सामायिक आदि क्रिया कर्म कर चार प्रकार के आहार का त्याग कर उपवास ग्रहण करता है [गिहवावारं चत्ता धम्मचिंताए रति गमिऊण] घर के समस्त व्यापार को छोड़कर धर्मध्यान पूर्वक तेरस और सप्तमी की रात्रि बिताता है [पच्चूसे उद्वित्ता किरियाकम्मं च कादूण] सबेरे उठकर सामायिक आदि क्रिया-कर्म करता है [सत्थब्भासेण पुणो दिवसं गमिऊण वंदणं किच्चा] अष्टमी चौदस का दिन शास्त्राभ्यास धर्मध्यान पूर्वक बिताकर अपराह्न के समय सामायिक आदि क्रिया कर्म कर [रत्ति णेदण तहा पच्चूदे वंदणं किच्चा] रात्रि वैसे ही धर्मध्यान पूर्वक बिताकर (नौमी / पूर्णमासी) के सबेरे के समय सामायिक वन्दना कर [पुज्जणविहिं च किच्चा पत्तं गहिऊण णवरि तिविहं पि] पूजन विधान कर तीन प्रकार के पात्रों को पडगाह कर [भुंजाविऊण पत्तं भुंजंतो पोसहो होदि] उन पात्रों को भोजन कराकर आप भोजन करता है उसके प्रोषध होता है ।

  छाबडा