
एक्कं पि णिरारंभं उववासं जो करेदि उवसंतो
बहु-भव-संचिय-कम्मं सो णाणी खवदि लीलाए ॥377॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णाणी] ज्ञानी [णिरारंभं] आरम्भरहित [उवसंतो] उपशमभाव सहित होता हुआ [एक्कं पि उपवासं करेदि] एक भी उपवास करता है [सो बहुभवसंचियकम्मं लीलाए खवदि] वह अनेक भवों में संचित किये हुए कर्मों को लीलामात्र में क्षय करता है ।
छाबडा