+ सचित्तविरत -
सच्चित्तं पत्त -फलं छल्ली मूलं च किसलयं वीयं
जो ण य भक्खदि णाणी सचित्त-विरदो हवे सो दु ॥379॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णाणी] ज्ञानी (सम्यग्दृष्टि श्रावक) [पत्तफलं छल्लीमूलं च किसलयं बीयं सच्चित्तं] पत्र, फल, त्वक्, छाल, मूल, कोंपल और बीज इन सचित्त वस्तुओं को [ण य भक्खदि] नहीं खाता है [सो दु सचित्तवरिदो हवे] वह सचित्तविरत श्रावक होता है ।

  छाबडा