
जो चउविहंपि भोज्जं रयणीए णेव भुंजदे णाणी
ण य भुंजावदि अण्णं णिसिविरओ सो हवे भोज्जो ॥382॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णाणी] ज्ञानी [रयणीए] रात्रि में [चउविहं पि भोज्जं] अशन, पान, खाद्य, स्वाद्य चार प्रकार के आहार को [णेव भुंजदे] नहीं भोगता है - नहीं खाता है [अण्णं ण य भुंजावइ] दूसरे को भी भोजन नहीं कराता है [सो णिसिविरओ भोज्जो हवे] वह श्रावक रात्रिभोजन का त्यागी होता है ।
छाबडा