
जो णिसि-भुत्तिं वज्जदिसो उववासं करेदि छम्मासं
संवच्छरस्स मज्झे आरंभं चयदि रयणीए ॥383॥
अन्वयार्थ : [जो णिसिभुत्तिं वज्जदि] जो पुरुष रात्रि-भोजन को छोड़ता है [सो] वह [संवच्छरस्स मज्झे] एक वर्ष में [छम्मासं उवासं करेदि] छह महिने का उपवास करता है [रयणीए आरंभं मुयदि] रात्रिभोजन का त्याग होने के कारण भोजन सम्बन्धी आरम्भ का भी त्याग करता है और व्यापार आदिक का भी आरम्भ छोड़ता है सो महा दया का पालन करता है ।
छाबडा