+ ब्रह्मचर्य प्रतिमा -
सव्वेसिं इत्थीणं जो अहिलासं ण कुव्वदे णाणी
मण-वाया- कायेण य बंभ-वई सो हवे सदओ ॥384॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णाणी] ज्ञानी (सम्यग्दृष्टि श्रावक) [सव्वेसिं इत्थीणं अहिलासं] सब ही चार प्रकार की स्त्री देवांगना, मनुष्यणी, तिर्यंचणी, चित्राम की इत्यादि स्त्रियों की अभिलाषा [मण वाया कायेण य] मन वचन काय से [ण कुव्वदे] नहीं करता है [सो सदओ बंभवई हवे] वह दया का पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य प्रतिमा का धारक होता है ।

  छाबडा