+ आरम्भ-त्याग प्रतिमा -
जो आरंभं ण कुणदि अण्णं कारयदि णेव अणुमण्णे
हिंसा-संतट्ठ-मणो चत्तारंभो हवे सो हु ॥385॥
अन्वयार्थ : [जो आरंभं ण कुणदि] जो श्रावक गृहकार्य सम्बन्धी कुछ भी आरम्भ नहीं करता है [अण्णं कारयदि णेय अणुमण्णे] दूसरे से भी नहीं कराता है, करते हुए को अच्छा भी नहीं मानता है [हिंसासंतट्ठमणो] हिंसा से भयभीत मनवाला [सो हु चत्तारंभो हवे] वह निश्चय से आरम्भ का त्यागी होता है ।

  छाबडा