
जो परिवज्जइ गंथं अब्भंतर-बाहिरं च साणंदो
पावं ति मण्णमाणो णिग्गंथो सो हवे णाणी ॥386॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णाणी] ज्ञानी [अब्भंतर बाहिरं च गंथं] अभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार के परिग्रह को [पावं ति मण्णमाणो] पाप का कारण मानता हुआ [साणंदो] आनन्द सहित [परिवज्जइ] छोड़ता है [सो णिग्गंथो हवे] वह निर्ग्रंथ होता है ।
छाबडा