+ अनुमोदनविरति प्रतिमा -
जो अणुमणणं ण कुणदि गिहत्थ-कज्जेसु पाव-मूलेसु
भवियव्वं भावंतो अणुमण-विरओ हवे सो दु ॥388॥
अन्वयार्थ : [जो] जो (श्रावक) [पावमुलेसु] पाप के मूल [गिहत्थकज्जेसु] गृहस्थ के कार्यों में [भवियव्यं भावंतो] 'जो भवितव्य है सो होता है' ऐसी भावना करता हुआ [अणुमणणं ण कुणदि] अनुमोदना नहीं करता है [सो दु अणुमणविरओ हवे] वह अनुमोदनविरति प्रतिमाधारी श्रावक है ।

  छाबडा