जो पुण चिंतदि कज्जं सुहासुहं राय-दोस-संजुत्तो
उवओगेण विहीणं स कुणदि पावं विणा कज्जं ॥389॥
अन्वयार्थ : [जो पुण] जो [उवओगेण विहीणं] बिना प्रयोजन [रायदोससंजुत्तो] रागद्वेष संयुक्त हो [सुहासुहं कज्जं चिंतदि] शुभ अशुभ कार्य का चिन्तवन करता है [स विणा कज्जं पावं कुणदि] वह पुरुष बिना कार्य पाप उत्पन्न करता है ।

  छाबडा