
जो णव-कोडि-विसुद्धं भिक्खायरणेण भुंजदे भोज्जं
जायण-रहियं जोग्गं उद्दिट्ठाहार-विरदो सो ॥390॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णव कोडि विसुद्धं] नव कोटि विशुद्ध [भिक्खायरणेण] भिक्षाचरणपूर्वक [जायणरहियं] याचना रहित [जोग्गं] योग्य [भोज्जं भुंजदे] आहार को ग्रहण करता है [सो उद्दिट्ठाहारविरदो] वह उद्दिष्ट आहार का त्यागी है ।
छाबडा