जो सावय-वय-सुद्धो अंते आराहणं परं कुणदि
सो अच्चुदम्हि सग्गे इंदो सुर-सेविदो होदि ॥391॥
अन्वयार्थ : [जो सावयवयसुद्धो] जो श्रावक व्रतों से शुद्ध है [अंते आराहणं परं कुणदि] और अंतसमय में उत्कृष्ट आराधना (दर्शन ज्ञान चारित्र तप का आराधन) करता है [सो अच्चुदम्मि सग्गे] वह अच्युत स्वर्ग में [सुरसेविदो इन्दो होदि] देवों से सेवनीय इन्द्र होता है ।

  छाबडा