जो रयणत्तय-जुत्तो खमादि- भावेहि परिणदो णिच्चं
सव्वत्थ वि मज्झत्थो सो साहू भण्णदे धम्मो ॥392॥
अन्वयार्थ : [जो रयणत्तयजुत्तो] जो पुरुष रत्नत्रय (निश्चय व्यवहाररूप सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) सहित हो [खमादिभावेहि णिच्चं परिणदो] क्षमादिभाव (उत्तम क्षमा को आदि देकर दस प्रकार का धर्म) से नित्य (निरन्तर) परिणत हो [सव्वत्थ वि मज्झत्थो] सब जगह (सुख-दुःख, तृण-कंचन, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, निन्दा-प्रशंसा, जीवन-मरण आदि में) समभावरूप रहे, रागद्वेष रहित रहे [सो साहू धम्मो भण्णदे] वह साधु है और उसी को धर्म कहते हैं, क्योंकि जिसमें धर्म है, वही धर्मकी मूर्ति है, वह ही धर्म है ।

  छाबडा