सो चेव दहप्पयारो खमादि-भावहिं सुक्खसारेहिं
ते पुणु भणिज्जमाणा मुणियव्वा परम-भत्तीए ॥393॥
अन्वयार्थ : [सो चेव खमादि भावहिं दहप्पयारो सुक्खसारेहिं] वह मुनिधर्म क्षमादि भावों से दस प्रकार का है, कैसा है ? सौख्यसार कहिये सुख इससे होता है या सुख इस में है अथवा सुख से सार है-प्रसिद्ध है-ऐसा है [ते पुण भणिजमाणा परमभत्तीए मुणियव्वा] वह दस प्रकार का धर्म (जिसका वर्णन अब करेंगे) भक्ति से (उत्तम धर्मानुराग से) जानने योग्य है ।

  छाबडा