
कोहेण जो ण तप्पदि सुर-णर-तिरिएहिं कीरमाणे वि
उवसग्गे वि रउद्दे तस्स खमा णिम्मला होदि ॥394॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [सुरणरतिरिएहिं] देव मनुष्य तिर्यंच आदि से [रउद्दे उवसग्गे कीरमाणे वि] रौद्र उपसर्ग करने पर भी [कोहेण ण तप्पदि] क्रोध से तप्तायमान नहीं होता है [तस्स णिम्मला खिमा होदि] उस मुनि के निर्मल क्षमा होती है ।
छाबडा