
उत्तम-णाण-पहाणो उत्तम-तवयरण-करण-सीलो वि
अप्पाणं जो हीलदि मद्दव-रयणं भवे तस्स ॥395॥
अन्वयार्थ : [उत्तमणाणपहाणो] जो मुनि उत्तम ज्ञान से तो प्रधान हो [उत्तमतवयरणकरणसीलो वि] उत्तम तपश्चरण करने का जिसका स्वभाव हो [जो अप्पाणं हीलदि] जो अपने आत्मा को मद-रहित करे - अनादररूप करे [तस्स मद्दवरयणं भवे] उस मुनि के मार्दव नामक धर्मरत्न होता है ।
छाबडा