
जो चिंतेइ ण वंकं ण कुणदि वंकं ण जंपदे वंकं
ण य गोवदि णिय-दोसं अज्जव-धम्मो हवे तस्स ॥396॥
अन्वयार्थ : [जो वकं ण चिंतेइ] जो मुनि मन में वक्रतारूप चिन्तवन नहीं करे [वंकं ण कुणदि] काय से वक्रता नहीं करे [वंकं ण जंपदे] वचन से वक्ररूप नहीं बोले [य णियदोसं ण गोवदि] और अपने दोषों को नहीं छिपावे [तस्सअज्जवधम्मो हवे] उस मुनि के उत्तम आर्जव धर्म होता है ।
छाबडा