सम-संतोस-जलेणं जो धोवदि तिव्व -लोह-मल-पुंजं
भोयण-गिद्धि-विहीणो तस्स सउच्चं हवे विमलं ॥397॥
अन्वयार्थ : [जो] जो (मुनि) [समसंतोसजलेणं य] समभाव (रागद्वेष रहित परिणाम) और सन्तोष (सन्तुष्ट भाव) रूपी जल से [तिव्वलोहमलपुंजं] तीव्र तृष्णा और लोभरूपी मल के समूह को [धोवदि] धोवे (नाश करे) [भोयणगिद्धिविहीणो] भोजन की गृद्धि (अति चाह) से रहित हो [तस्स सउच्चं विमलं हवे] उस मुनि का चित्त निर्मल होता है अतः उसके उत्तम शौच धर्म होता है ।

  छाबडा