
जिण-वयणमेव भासदि तं पालेदुं असक्कमाणो वि
ववहारेण वि अलियं ण वददि जो सच्च-वाई सो ॥398॥
अन्वयार्थ : [जिणवयणमेव भासदि] जो मुनि जिनसूत्र ही के वचन को कहे [तं पालेदं असक्कमाणो वि] उसमें जो आचार आदि कहा गया है उसका पालन करने में असमर्थ हो तो भी अन्यथा नहीं कहे [जो ववहारेण वि अलियं ण वददि] और जो व्यवहार से भी अलीक नहीं कहे [सो सच्चवाई] वह मुनि सत्यवादी है, उसके उत्तम सत्यधर्म होता है ।
छाबडा