जो जीव-रक्खण परो गमणागमणादि -सव्व-कज्जेसु
तण-छेदं पि ण इच्छदि संजम-धम्मो हवे तस्स ॥399॥
अन्वयार्थ : [जो जीवरक्खणपरो] जो मुनि जीवों की रक्षा में तत्पर होता हुआ [गमणागमणादिसव्वकज्जेसु] गमन आगमन आदि सब कार्यों में [तणछेदं पिण इच्छदि] तृण का छेदमात्र भी नहीं चाहता है, नहीं करता है [तस्य संजयधम्मो हवे] उस मुनि के संयमधर्म होता है ।

  छाबडा