इह-पर-लोय-सुहाणं णिरवेक्खो जो करेदि सम-भावो
विविहं काय-किलेसं तव-धम्मो णिम्मलो तस्स ॥400॥
अन्वयार्थ : [जो] जो (मुनि) [इहपरलोयसुहाणं णिरवेक्खो] इसलोक परलोक के सुख की अपेक्षा से रहित होता हुआ [समभावो] (सुख-दुःख, शत्रु-मित्र, तृण-कंचन, निन्दा-प्रशंसा आदि में रागद्वेष रहित) समभावी होता हुआ [विविहं कायकिलेसं] अनेक प्रकार कायक्लेश [करेदि] करता है [तस्स णिम्मलो तवधम्मो] उस मुनि के निर्मल तपधर्म होता है ।

  छाबडा