
इह-पर-लोय-सुहाणं णिरवेक्खो जो करेदि सम-भावो
विविहं काय-किलेसं तव-धम्मो णिम्मलो तस्स ॥400॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [इहपरलोयसुहाणं णिरवेक्खो] इसलोक परलोक के सुख की अपेक्षा से रहित होता हुआ [समभावो] समभावी होता हुआ [विविहं कायकिलेसं] अनेक प्रकार कायक्लेश [करेदि] करता है [तस्स णिम्मलो तवधम्मो] उस मुनि के निर्मल तपधर्म होता है ।
छाबडा