
जो चयदि मिट्ठ-भोज्जं उवयरणं रय-दोस-संजणयं
वसदिं ममत्त-हेदुं चाय-गुणो सो हवे तस्स ॥401॥
अन्वयार्थ : [जो मिट्ठभोज्जं चयदि] जो मुनि मिष्ट भोजन को छोड़ता है [रायदोससंजणयं उवयरणं] रागद्वेष उत्पन्न करनेवाले उपकरण को छोड़ता है [ममत्तहेदुं वसदिं] ममत्व का कारण वसतिका को छोड़ता है [तस्स चायगुणो हवे] उस मुनि के त्याग नाम का धर्म होता है ।
छाबडा