
ति-विहेण जो विवज्जदि चेयणमियरं च सव्वहा संगं
लोय-ववहार -विरदो णिग्गंथत्तं हवे तस्स ॥402॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [लोयववहारविरदो] लोक व्यवहार से विरक्त होकर [चेयणमियरं च सव्वहा संगं] चेतन अचेतन परिग्रह को सर्वथा [तिविहेण विवज्जदि] तीनों प्रकार से छोड़ता है [तस्स णिग्गंथ हवे] उसे निर्ग्रन्थत्व होता है।
छाबडा