+ ब्रह्मचर्य धर्म -
जो परिहरेदि संगं महिलाणं णेव पस्सदे रूवं
काम-कहादि- णिरीहो णव-विह-बंभं हवे तस्स ॥403॥
अन्वयार्थ : [जो महिलाणं संगं परिहरेदि] जो मुनि स्त्रियों की संगति नहीं करता है [रूवं णेच पस्सदे] उनके रूप को नहीं देखता है [कामकहादिणिरीहो] काम की कथा आदि (स्मरणादिक से) रहित हो [णव विह] ऐसा (नवधा कहिये मन-वचन-काय कृत-कारित-अनुमोदना और तीनों काल से) नव कोटि से करता है [तस्स बंभं हवे] उसे (मुनि के) ब्रह्मचर्य धर्म होता है ।

  छाबडा