
जो ण वि जादि वियारं तरुणियण-कडक्ख- बाण-विद्धो वि
सो चेव सूर-सूरो रण-सूरो णो हवे सूरो ॥404॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरुष [तरुणियणकडक्खबाणविद्धो वि] स्त्रियों के कटाक्षरूपी बाणों से आहत होकर भी [वियारं ण वि जादि] विकार को प्राप्त नहीं होता है [सो चेव सूरमरो] वह शूरवीरों में प्रधान है [रणसूरो सूरो णो हवे] और जो रण में शूरवीर है वह शूरवीर नहीं है ।
छाबडा