
हिंसारंभो ण सुहो देव-णिमित्तं गुरूण कज्जेसु
हिंसा पावं ति मदो दया-पहाणे जदो धम्मो ॥406॥
अन्वयार्थ : [हिंसा पावं ति मदो जदो धम्मो दयापहाणो] जिससे हिंसा हो वह पाप है, धर्म है सो दयाप्रधान है ऐसा कहा गया है [देवणिमित्तं गुरूण कज्जेसु हिसारंभो सुहो ण] इसलिये देव के निमित्त तथा गुरु के काय के निमित्त हिंसा आरम्भ शुभ नहीं है ।
छाबडा