
इदि एसो जिण-धम्मो अलद्ध-पुव्वो अणाइ -काले वि
मिच्छ त्त-संजुदाणं जीवाणंलद्धि-हीणाणं ॥408॥
अन्वयार्थ : [इदि एसो जिणधम्मो] इसप्रकार से यह जिनेश्वर देव का धर्म [अणाइकाले वि] अनादिकाल में [लद्धिहीणाणं] जिनको स्व-काल आदि की प्राप्ति नहीं हुई है ऐसे [मिछत्तसंजदाणं जीवाणं] मिथ्यात्व सहित जीवों के [अलद्धपुव्वो] अलब्धपूर्व है अर्थात् पहिले कभी नहीं पाया ।
छाबडा