पुण्णं पि जो समिच्छदि संसारो तेण ईहिदो होदि
पुण्णं सुगई -हेदुं पुण्ण-खएणेव णिव्वाणं ॥410॥
अन्वयार्थ : [जो पुण्णं पि समिच्छदि] जो पुण्य को भी चाहता है [तेण संसारो ईहिदो होदि] वह पुरुष संसार ही को चाहता है [पुण्णं सुग्गई हेदुं] क्योंकि पुण्य सुगति के बन्ध का कारण है [णिव्वाणं पुण्णखएणेव] और मोक्ष पुण्य के भी क्षय से होता है।

  छाबडा