
जो अहिलसेदि पुण्णं सकसाओ विसय-सोक्ख -तण्हाए
दूरे तस्स विसोही विसोहि-मूलाणि पुण्णाणि ॥411॥
अन्वयार्थ : [जो सकसाओ विसयसोक्खतण्हाए पुण्णं अहिलसेदि] जो कषाय सहित होता हुआ विषयसुख को तृष्णा से पुण्य की अभिलाषा करता है [तस्स विसोही दूरे] उसके विशुद्धता दूर है [पुण्णाणि विसोहिमूलाणि] और विशुद्धता है मूल कारण जिसका, ऐसा पुण्यकर्म है ।
छाबडा