
पुण्णासाए ण पुण्णं जदो णिरीहस्स पुण्ण-संपत्ती
इय जाणिऊण जइणो पुण्णे वि म आयरं कुणह ॥412॥
अन्वयार्थ : [जदो पुण्णासाए पुण्णं ण] क्योंकि पुण्य की वांछा से तो पुण्य-बन्ध होता नहीं है [णिरीहस्स पुण्णसंपत्ती] और वांछारहित पुरुष के पुण्य का बन्ध होता है [जइणो इय जाणिऊण] इसलिये भी हे यतीश्वरों ! ऐसा जानकर [पुण्णे वि म आयरं कुणह] पुण्य में भी आदर मत करो ।
छाबडा