पुण्णं बंधदि जीवो मंद-कसाएहिं परिणदो संतो
तम्हा मंद-कसाया हेऊ पुण्णस्स ण हि वंछा ॥413॥
अन्वयार्थ : [जीवो मंदकसाएहिं परिणदो संतो पुण्णं बंधदि] जीव मन्दकषायरूप परिणमता हुआ पुण्यबन्ध करता है [तम्हा पुण्णस्स हेऊ मंदकसाया] इसलिये पुण्यबन्ध का कारण मन्दकषाय है [वंछा ण हि] वांछा पुण्यबन्ध का कारण नहीं है ।

  छाबडा