
किं जीव-दया धम्मो जण्णे हिंसा वि होदि किं धम्मो
इच्चेवमादि-संका-तदक रणं जाण णिस्संका ॥414॥
अन्वयार्थ : [किं जीवदया धम्मो] यह विचार करना कि 'क्या जीवदया धर्म है ?' [जण्णे हिंसा वि होदि किं धम्मो] अथवा यज्ञ में पशुओं के वधरूप हिंसा होती है सो धर्म है ? [इच्चेवमादिसंका] इत्यादि धर्म में संशय होना सो शंका है [तदकरणं णिस्संका जाण] इसका नहीं करना सो निःशंका है ऐसा जान ।
छाबडा