+ निःकांक्षित गुण -
जो सग्ग-सुह-णिमित्तं धम्मं णायरदि दूसह-तवेहिं
मोक्खं समीहमाणो णिक्खंखा जायदे तस्स ॥416॥
अन्वयार्थ : [जो] जो (सम्यग्दृष्टि) [दूसहतवेहिं] दुद्धर तप से भी [मोक्खं समीहमाणो] मोक्ष की ही वांछा करता हुआ [सग्गसुहणिमित्तं धम्मं णायरदि] स्वर्गसुख के लिये धर्म का आचरण नहीं करता है [तस्स णिक्खंखा जायदे] उसके निःकांक्षित गुण होता है।

  छाबडा